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दिमाग कैसे सूचनाओं की अनदेखी करता है

हमारा दिमाग एक ऐसी संरचना है, जिसको समझना इस संसार में सबसे ज्यादा कठिन है.

मानव मस्तिष्क इस संसार में सबसे जटिल संरचना है और यही जटिल दिमाग हमसे झूठ भी बोलता है.

अब आप कहेंगे कि दिमाग हमसे झूठ कैसे कह सकता है? लेकिन ऐसा सच में है.

दिमाग हमसे झूठ कहता है. अगर दिमाग हमसे झूठ नहीं कहता,

तो हम आखिर हर काम को जो हम करना चाहते हैं. वह क्यों नहीं कर पाते हैं.

दरअसल झूठ बोलने से मतलब है, दिमाग कुछ बातों को अनदेखा कर देता है.

और अनदेखा करके उस झूठी बात को भी स्वीकार करने में नहीं झिझकता,

जो उसे प्रिय नहीं लगती है. यह सुनकर आपके मन में कई तरह के प्रश्न आ रहे होंगे और यह पूरा पढ़ कर आप इस प्रश्न का उत्तर भी जान जाएंगे.

दिमाग बाहरी वातावरण से देखकर सुनकर और त्वचा के द्वारा इंफॉर्मेशन को ग्रहण करता है.

और इसी इंफॉर्मेशन के जरिए हम अच्छा निर्णय भी ले पाते हैं.

यह दिमाग के द्वारा ली गई जानकारियां ही होती है, जिसके बदौलत हम अच्छा से अच्छा निर्णय ले पाते हैं.

आखिर जब हम किसी जानकारी को इकट्ठा ही नहीं करेंगे.

तो उस जानकारी के आधार पर कोई एक्शन कैसे लेंगे.

पर हमारा दिमाग कुछ जानकारियों को इकट्ठा नहीं करता है,

बल्कि उसे इग्नोर कर देता है. लेकिन दिमाग ऐसा करता क्यों है यह एक बहुत बड़ी गुत्थी है.

और अब आप यह सोचेंगे कि ब्रेन जानकारियों की अनदेखी क्यों करेगा, तो आज आपको इसके कारण के बारे में भी बताते चलें.

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उदहारण से समझते हैं इसे

दरअसल हमारा दिमाग उस हर एक जानकारी को इकट्ठा करने से मना कर देता है,

जो हमें अप्रिय लगती है या जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. वह कोई भी चीज हो,

एक बार जिसे दिमाग स्वीकार करने से मना कर देगा. फिर आप कुछ भी करके ना तो उस बात का पालन करोगे, ना ही उस बात को याद रखने की इच्छा करोगे.

अब चाहे वो कुछ भी हो चाहे वह कोई बुरी यादें हो, जो आपका दिमाग याद नहीं करना चाहता हो.

जिससे आपके मानसिक स्थिति को चोट पहुंचे. या फिर कोई व्यक्ति जो आपके दिमाग को ज्यादा ठेस पहुंचा रहा हो.

या फिर कोई भी ऐसी सलाह जो आपके आनंद में खलल पहुंचा रहा हो.

उदाहरण

इसका एक अच्छा उदाहरण देता हूं मैं आपको, जैसे मान लो कि आप एक रेस्टोरेंट्स में जाते हो और आप वहां एक ऐसी स्वादिष्ट खाने वाली चीज या मिठाई जैसी चीजें देखते हो,

जिसकी कैलोरी बहुत ज्यादा हो. और आपका मन उसे खाने के लिए तडपने लगता हैं.

आप बहुत ज्यादा मोटे हो और आपको डॉक्टर ने यह सलाह दिया है कि आपको कोई भी अधिक कैलोरी वाली चीजें नहीं खानी है.

कोई भी अधिक फैट वाली चीज भी आपको नहीं खानी है.

लेकिन आप अपने जीभ पर कंट्रोल नहीं कर पा रहे हो. आपको वह मिठाई खानी ही है.

आपका ब्रेन इस बात की जानकारी को इग्नोर कर रहा है कि वह चीज आपके लिए हानिकारक है.

और आप उसको खाने लगते हो जबकि आपको वो खाने से मना किया गया हैं, आपके स्वास्थ्य के लिए.

आसान शब्दों में बताऊं तो आप यह बात जानते हो कि उस भोजन को खाने से आपके स्वास्थ्य को हानि होगी

लेकिन फिर भी चुकी वह स्वादिष्ट है, आप उसको खाते हो. यानी आप उस जानकारी को इग्नोर करते हो कि वह आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.

क्योंकि वह स्वादिष्ट है. अगर यह इंफॉर्मेशन हम स्वीकार कर लेंगे तो हमारा ब्रेन उस काम को करने से हमें रोकेगा. जो की हम बिलकुल भी स्वीकार करना नहीं कहते हैं.

Active information avoidance

विज्ञान की भाषा में इस तरह के व्यवहार को एक्टिव इनफॉरमेशन अवॉइडेंस (Active Information Avoidance) कहते हैं.

मनुष्य के इस व्यवहार पर यूएसए में स्थित कार्नेजी मेंलन यूनिवर्सिटी में शोध भी हुआ.

और बताया कि कैसे हमारा दिमाग हमारे साथ खेल खेलता हैं.

और हम अपने इसी आदत से अपने मंजिल तक कभी कभी पहुच भी नहीं पाते हैं.

हालाँकि इसके अपने ही फायदे हैं. इसी तरह कुछ और शोध उन लोगों पर भी हुआ.

जो एक घातक मस्तिष्क बीमारी से पीड़ित थे और उन्हें मेडिकल जांच की सलाह भी दी गई थी.

लेकिन उनमें से अधिकतर लोगों ने जांच नहीं कराई, दरअसल शोधकर्ताओं के अनुसार,

अधिकतम लोगों ने जांच केवल इसलिए नहीं कराया, क्योंकि वह भयमुक्त होकर जीना चाहते थे.

वो ये बात स्वीकार कर लेना चाहते थे कि भले ही वो जाँच नहीं कराएँगे.

लेकिन कम से कम इस बाते के तनाव से मुक्त तो रहेंगे.

यानी वो इस बात से डरते थे कि जांच कराने से कहीं कोई नकारात्मक परिणाम सामने निकलकर ना आ जाए.

वह अपने आशावादी सुरक्षा चक्र को टूटते हुए नहीं देखना चाहते थे.

इसलिए उन्होंने जांच नहीं कराई. यानि यहाँ पर सीधा सा बात रहा कि दिमाग ये बात सीधे सीधे अनदेखा कर दिया,

कि उन व्यक्तियों को कोई बीमारी भी हो सकती हैं.

दिमाग को सालों लगते हैं ये व्यवहार बनाने में

कार्नेजी मेलोन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इसे नाम दिया ऑप्टिमिज्म बबल (Optimism Bubble).

एक्टिव इंफॉर्मेशन अवॉइडेंस एक साइकोलॉजिकल प्रोटेक्शन स्ट्रेटजी (psychological protection strategy) है.

क्योंकि दिमाग को अपने इस व्यवहार को बनाने में कई महीने और साल लगते हैं.

सालों महीनो वही आदत बार बार दोहराते दोहराते दिमाग अप्रिय घटना को अस्वीकार करना सीख लेता हैं.

अब मस्तिष्क को अपने इस व्यवहार को बदलने में,

वह भी अचानक से, काफी एनर्जी लगेगा और यह तनाव को भी जन्म देगा.

इसलिए इंफॉर्मेशन से बचना दिमाग के लिए काफी आसान होता है. यही कारण हैं दिमाग अनदेखा करना सीख लेता हैं.

शोधकर्ताओं के अनुसार अगर आपको मनुष्य के इस व्यवहार को बदलना है तो पहले आपको उस से नजदीकी संबंध बनाने चाहिए.

उसके बाद आप को उसके स्वभाव को बदलने का प्रयास करना चाहिए.

उससे उसके मन मुताबिक बात कर बड़े ही प्यार से उसके इस आदत को बदलने का प्रयास करना चाहिए.

तो आपने देखा हमारा दिमाग आपसे काम ना करने के लिए किस प्रकार अनदेखा करने का सहारा लेता है.

जो कि सच को स्वीकार न करके झूठ का सहारा लेना ही हुआ.

जानकारी विडियो से लीजिये